हिंदुत्व (शाब्दिक अर्थ: हिंदूपन या जीवन शैली) कोई हिन्दू धर्म नहीं बल्कि एक राजनीतिक विचारधारा है, जिसमें हिंदू राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक औचित्य को शामिल किया गया है I हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1870 में बंकिम चंद्र के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में आया था। उसके बाद 1892 में चंद्रनाथ बसु ने इसका इस्तेमाल किया था। फिर 1923 में विनायक दामोदर सावरकर ने ‘हिंदुत्व’ नाम से एक पुस्तिका लिखकर इस शब्द को लोकप्रिय बनाया।
हिंदुत्व के आंदोलन को दक्षिणपंथी राजनीति के रूप में और “शास्त्रीय अर्थों में लगभग फासीवादी” के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह वर्ण/जाति, लिंग भेद और हिंदू धर्म और अध्यात्म के प्रतीकों के साथ वर्तमान भारतीय समाज में समरसता वाले बहुसंख्यक और सांस्कृतिक प्रभुत्व की बात करता है। कुछ लोगों को इसके फासीवादी होने पर एतराज है। उनके मतानुसार हिंदुत्व “रूढ़िवाद” या “नैतिक निरपेक्षता” का एक उच्चतम रूप है। लेकिन वास्तव में यह अपनी घृणा, शोषण और उत्पीड़न द्वारा सत्ता दख़ल की अंतर्वस्तु के कारण, फासीवाद की ही तरह, एक राजनीतिक विचारधारा है।
सावरकर के हिंदुत्व को चंद शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है- हिंसा, प्रतिशोध, घृणा, बर्बरता। आक्रामक और क्रूर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना उनका सपना था। अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदुत्व’ में सावरकर ने हिंदुत्व को इस तरह परिभाषित किया है- “हिन्दू वही है जो सिंधु नदी से सिंधु समुद्र पर्यंत विस्तृत इस देश को अपनी पितृ भूमि मानता है, जो रक्त संबंध से उस जाति का वंशधर है जिसका प्रथम उद्गम वैदिक सप्त सिन्धुओं में हुआ और जो बाद में बराबर आगे बढ़ती हुई, अंतर्भूत को पचाती और उसे महनीय रूप देती हुई हिन्दू जाति के नाम से विख्यात हुई, जो उत्तराधिकार संबंध से उसी जाति की उसी संस्कृति को अपनी संस्कृति मानता है जो संस्कृत भाषा में संचित और जाति के इतिहास, कला, धर्म शास्त्र, व्यवहार शास्त्र, रीति नीति, पर्व और त्यौहार – इनके द्वारा अभिव्यक्त हुई है और जो इन सब बातों के साथ इस देश को अपनी पुण्य भूमि, अपने अवतारों और ऋषियों की, अपने आचार्यों और महापुरुषों की निवास भूमि तथा सदाचार और तीर्थ यात्रा की भूमि मानता है। हिंदुत्व के ये लक्षण हैं- एक राष्ट्र, एक जाति और एक संस्कृति। इन सब लक्षणों का अंतर्भाव करके संक्षेप में यों कहा जा सकता है- हिन्दू वह है जो सिंधु स्थान को अपनी पितृ भूमि ही नहीं पुण्य भूमि भी मानता है।”(पृष्ठ 120)।
सावरकर के समग्र वाङ्गमय में वह ईसाइयों और मुसलमानों को सलाह (एक तरह से चेतावनी) देते हुए कहते हैं- “तुम जो जाति, रक्त, संस्कृति और राष्ट्रीयता के बंधनों से हिन्दू ही हो और जिसे हिंसा के हाथ ने ही अपने पितृ गृह से जबर्दस्ती खींच लिया, तुम्हें यही करना है कि अपनी अनन्य भक्ति इस माता को अर्पण करो और इसे केवल पितृ भूमि नहीं, पुण्य भूमि मान कर पूजो और इस तरह फिर से हिन्दू संघ में आ जाओ।- बोहरा, खोजा, मेमन तथा अन्य मुसलमानों और ऐसे ही क्रिस्तानों के लिए यही रास्ता खुला है और यह केवल उनकी मर्जी पर है कि वे इसे स्वीकार करें या न करें। परन्तु जब तक वे इस मार्ग पर नहीं हैं हम उन्हें हिन्दू नहीं कह सकते।”
सावरकर के मुताबिक केवल हिंदू भारतीय राष्ट्र का अंग थे और हिंदू वो थे – “जो सिंधु से सागर तक फैली हुई इस भूमि को अपनी पितृ भूमि मानते हैं, जो रक्त संबंध की दृष्टि से उसी महान नस्ल के वंशज हैं, जिसका प्रथम उद्भव वैदिक सप्त सिंधुओं में हुआ था, जो उत्तराधिकार की दृष्टि से अपने आपको उसी नस्ल का स्वीकार करते हैं और इस नस्ल को उस संस्कृति के रूप में मान्यता देते हैं जो संस्कृत भाषा में संचित है।”
राष्ट्र की इस परिभाषा के चलते सावरकर का निष्कर्ष था कि ‘ईसाई और मुसलमान समुदाय, जो ज़्यादा संख्या में अभी हाल तक हिंदू थे और जो अभी अपनी पहली ही पीढ़ी में नए धर्म के अनुयायी बने हैं, भले ही हमसे साझा पितृ भूमि का दावा करें और लगभग शुद्ध हिंदू खून और मूल का दावा करें, लेकिन उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि नया पंथ अपना कर उन्होंने कुल मिलाकर हिंदू संस्कृति का होने का दावा खो दिया है।’
सावरकर के हिंदुत्व का सार संक्षेप प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम लिखते हैं – “सावरकर ने हिंदुत्व के सिद्धांत की व्याख्या शुरू करते हुए हिन्दुत्व और हिंदू धर्म में फ़र्क किया। लेकिन जब तक वे हिंदुत्व की परिभाषा पूरी करते, दोनों के बीच अंतर पूरी तरह से ग़ायब हो चुका था। हिंदुत्व और कुछ नहीं बल्कि राजनीतिक हिंदू दर्शन बन गया। यह हिंदू अलगाववाद के रूप में उभरकर सामने आ गया। अपना ग्रंथ समाप्त करते हुए सावरकर हिंदुत्व और हिंदूवाद के बीच के अंतर को पूरी तरह भूल गए।”
सावरकर के अनुसार-“ हिन्दू भारत में-हिंदुस्थान में- एक राष्ट्र हैं जबकि मुस्लिम अल्पसंख्यक एक समुदाय मात्र।“(पृष्ठ 25, सावरकर एंड हिंदुत्व,ए जी नूरानी, लेफ्टवर्ड, 2003)
हिंदू अपने सहिष्णुता, उदारता, धर्मनिरपेक्षता जैसे सद्गुणों पर सदैव गर्व करते रहे हैं, लेकिन सावरकर के विचार में यह गुण पतन का कारण हैं। वह हिंसा और प्रतिशोध के रास्ते पर चलने की बात करते हैं। उनका मानना है कि मुस्लिम समुदाय की निष्ठा हिंदुस्थान के प्रति कभी हो ही नहीं सकती। उनके अनुसार मुस्लिम और ईसाई धर्मावलंबियों की एक ही नियति है कि वे हिंदुस्थान को अपनी पितृ भूमि और पुण्य भूमि मानकर शरणागत हो जाएं, नहीं तो उन्हें दासवत जीवन व्यतीत करना होगा। तब भी शायद उन्हें उनके पूर्वजों के कथित अत्याचारों के दंड स्वरूप प्रतिशोध एवं बदले की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
उनके विचार में युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले हिन्दू राजाओं द्वारा अपने अधीन किए गए मुसलमान राजाओं की पत्नियों तथा बहू-बेटियों और प्रजा में सम्मिलित मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार न करना एक चूक थी। उनके मतानुसार, हिन्दू राजाओं और नागरिकों द्वारा एक साथ अनेक मुस्लिम स्त्रियों से जबरन विवाह करते हुए बलपूर्वक शारीरिक संबंध बनाकर हिन्दू समुदाय की जनसंख्या बढ़ानी चाहिए थी। उनका कहना है कि आज भी हिन्दू समुदाय को वह चूक नहीं करनी चाहिए, जो शिवाजी महाराज और चिमाजी अप्पा ने की जब उन्होंने अपने द्वारा पराजित मुस्लिम सरदारों और सुल्तानों की बहू बेटियों को ससम्मान उनके घर पहुंचा दिया।
बहुत बाद में जब जाने माने अमरीकी युद्ध पत्रकार टॉम ट्रेनर ने 1944 के लंबे साक्षात्कार के दौरान सावरकर से पूछा- आप मुसलमानों के साथ किस तरह का बर्ताव करने की योजना बना रहे हैं? सावरकर का उत्तर था- ‘एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में, आपके यहां के नीग्रो लोगों के साथ जैसा बर्ताव होता है, उसी भांति।’ यहां भी सावरकर नस्ली घृणा और हिंसा के साथ खड़े नजर आते हैं, जो किसी आधुनिक समाज के नेता, सुधारक या प्रगतिशील विचारक का लक्षण नहीं है।
(अवतार सिंह जसवाल लेखक और टिप्पणीकार हैं।)